बुधवार, 13 जुलाई 2016





मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

मौसम और बाजारवाद राष्ट्रीय सहारा (संपादकीय पेज २८/०४/२०१५

मौसम और बाजारवाद राष्ट्रीय सहारा (संपादकीय पेज २८/०४/२०१५ 
प्रसंगवश/विनय विक्रम सिंह
http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx

मौसम की मार झेल रहे देश के किसान बहुत परेशान हैं। बताया जाता है कि बेमौसम बरसात के कारण पांच राज्यों में लगभग 50 लाख हेक्टेयर में खड़ी रबी की फसल क्षतिग्रस्त हो चुकी है। वैज्ञानिक ऐसी घटना के लिए जलवायु परिवर्तन को प्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराते हैं। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पूना के अनुसार पश्चिमी विक्षोभ से हिमालय के मौसम पर दिसंबर से अप्रैल माह के बीच खास प्रभाव पड़ता है। पश्चिमी विक्षोभ का जन्म भूमध्य सागर में होता है जो पश्चिमी हवाओं के साथ तूफान और चक्रवात लेकर भारत के उत्तरी क्षेत्र से प्रवेश करता है और वहां से पश्चिम, दक्षिण और पूर्व की तरफ आगे बढ़ता है। संस्थान द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ही तिब्बत के पठारी क्षेत्र में हाल के दशकों के दौरान गर्मी की तीव्रता और अवधि दोनों बढ़ रही है। साथ ही बंसत के आरंभ में हिमालयी क्षेत्र में बरसात और बर्फबारी की बढ़ती घटना ठंड के मौसम के विस्तार को दशर्ती है। जलवायु परिवर्तन के ये लक्षण पहले ही उजागर किए जा चुके हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रत्येक असाधारण मौसमी घटनाओं में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। र्वल्ड मेट्रोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन की ताजा रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि अगर हम लोग इसी तरह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि करते रहे तो 21वी सदी के अंत तक पृवी का तापमान चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। जलवायु परिवर्तनशीलता और जलवायु परिवर्तन हर जगह लोगों और समुदायों के लिए कई जोखिम प्रस्तुत करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) के अध्यक्ष राजेन्द्र पचौरी ने कहा, ‘‘कार्रवाई करने के लिए यह अलार्म है। अगर दुनिया ने अब भी कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए कुछ नहीं किया तो मामला हाथ से निकल जाएगा।’ रिपोर्ट के सारांश में कहा गया है- ‘‘तापमान की डिग्री बढ़ने के साथ-साथ गंभीर, व्यापक और सुधारे न जा सकने वाले असर होंगे।’ क्योटो प्रोटोकॉल के खत्म होने के बाद की संधि पर दुनिया सहमत नहीं हो पाई है। सबसे ताकतवर देश कहा जाने वाला अमेरिका भी जलवायु परिवर्तन को काबू में करने के लिए कोई प्रस्ताव पास नहीं करवा पाया है क्योंकि अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने की कोशिशें व्यावसायिक विकास में रोक लगाती हैं। जलवायु परिवर्तन का असर अब सब जगह देखा जा सकता है। इसने हम सबको परेशान करना शुरू कर दिया है। यह और कितना बुरा और गंभीर हो सकता है, यह निर्भर करेगा हमारे फैसलों पर। यदि पर्यावरण अनुकूल फैसले लिये गये तो दुनिया बच सकती है अन्यथा भविष्य में पछतावे के सिवा कुछ भी नहीं बचेगा।

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

जिंदगी तुम थमना तो चाहती नहीं और न रुकना

जिंदगी तुम थमना तो चाहती नहीं और न रुकना ,लेकिन  सुस्ताने दो थोड़ा,  यात्रा तो दूसरी है झारखंड का  टिकट मिल नहीं रहा था तो बहुत जुगाड़ किया स्लीपर का मिल गया  है आखिर वो दिन भी आया साढ़े तीन की ट्रेन थी पत्नी ने लिस्ट बना लिया था की मुझे बैग में क्या ले जाना  है और क्या नहीं  तैयारी तो अधाधूरी ही होती अगर तुम लिस्ट से न चलती तुम मेरी यात्रा में भले ही मेरे साथ न हो लेकिन तुम्हारा मैनेजमेंट ही है जो पूरी यात्रा को बोझिल नहीं करता तुम्हे शुक्रिया कंहू………… स्टेशन चारबाग ट्रैन लेट,  साढ़े तीन की ट्रैन रात नौ बजे आती है सफर शुरू  होता है स्लीपर का टिकट को थर्ड एसी में करने का जद्दोजहद टी टी साहब मिलते  हैं कहते है जाकर बी थ्री में ४८ पर बैठिये सफर शुरू हो चुका है एक लाल धरती का,एक जंगल का ,एक दूर तक वीरान पड़े पत्थरों का, ताड़ के पेड का,महुए का ,और बहुत कुछ का जिसका जिक्र करने से ......................
सुबह के चार बजे सीट पूछने के चक्कर  में एक महानुभाव जगा देते हैं आँख की नींद कोशी की धरती पर  कोसो दूर ……,……किसी तरह सोने की कोशिश में सुबह आठ बजे जागने पर एक प्यारी बच्ची के पैरो  की पायल आँखों  कार्निआ को जो  सुकून देती  है ……………………………बच्ची ने जब मुझे देखा तो शरमा रही थी लगता था वह मुझे पहले से ही जानती हो सफर अच्छा कट रहा था उसकी मुस्कुराहट ने सुबह जगाने वाला कोलाहल कम कर दिया था और एक अल्हाई सी सुबह में चाय चाय के साथ एक प्यारी सी बच्ची की मुस्कराहट मेरा स्वागत कर रही थी चलने वाले बहुत लोग थे ,ट्रैन चल रही थी ,जिंदगी भी चल रही थी ,लोग चल रहे थे ,बात चल रही थी  हो वही सब रहा था जो हर ट्रैन के अंदर और बाहर होता है लकिन एक चीज थी जो अलग थी इस ट्रैन का वेटर सात रूपए की चाय  दस में बेंच रहा था और कोई पूछने वाला नहीं था भारत की यही बिडम्बना

  है की सब्जी के ठेले और कई चीजों में हम अंतर नहीं कर पाते ऐ अंतर मेरे डिब्बै  में बैठे एक सेना के जवान ने किया खैर मेरी ट्रैन बिहार से झारखंड में प्रवेश कर रही थी मेरा स्टेशन जैसीडीह आने वाला था और यही मेरा गंतव्य था यही से मुझे झारखंड के आगे की यात्रा शुरू करनी थी झारखण्ड का जैसीडीह स्टेशन यंहा के कई पर्यटन  वाली जगहों को जोड़ता है और झारखण्ड के सबसे बड़े पर्यटन स्थलो में शुमार बैजनाथ धाम भी जाने के लिये , त्रिकुट पहाड़ , नंदन पहाड़ , नवलखा मंदिर और बहुत सारे पर्यटन स्थलों तक जैसीडीह स्टेशन के माध्यम से रेल यात्रा करके पहुंचा जा सकता है।  मैं स्टेशन से अपने होटल मधुमाला इंटरनेशनल पहुँचता हूँ इस होटल के मालिक से मेरा पुराना परिचय है इनकी भी कहानी अम्बानी की कहानी से मेल खाती है और भारत के उन तमाम उधोगपतियों से जो फर्श से अर्श पर गए हैं।  इस होटल के मालिक सिन्हा जी पहले झारखण्ड के गोड्डा जिले के एक छोटे से कसबे मे  पान की  दुकान चलाते  थे. उधार  और मारपीट के चक्कर में गुजरात की यात्रा पर चले गए वापस लौटे तो देओघर में होटल बनाया ,स्कूल बनाया और आज देओघर के सबसे बड़े रईशो में शुमार है करोडो का साम्राज्य खड़ा किया अब पता नही इसमें मोदी फैक्टर कितना है क्यूंकि ऐ पान वाले थे और मोदी चाय वाले हैं मैंने बस सिन्हा से इतना कहा अगर आप चाय बेंचते  तो प्रधानमन्त्री बन  सकते थे।  सिन्हा का स्कूल इस समय उस  जगह का सबसे प्रतिष्ठित स्कूल है इसमें  स्विमिंग पुल से लेकर हॉर्स राइडिंग तक मुहैया है।झारखण्ड यानी झार जो की वन से मेल खाता  है और यह एक वन प्रदेश है जो झारखण्ड आंदोलन (वनांचल आंदोलन ) के द्वारा बिहार से अलग करके बनाया गया है यंहा खनिज की अधिकता है इसलिये  स्थानीये भाषा में इसे रूर भी कहा जाता है पंद्रह नवम्बर दो हजार(आदिवासी नायक बिरसा मुंडा के जन्मदिन ) को यह भारत का एक और राज्य बना।मुग़ल सल्तनत के दौरान झारखण्ड को कुकरा क्षेत्र  के नाम से जाना जाता था। 

देओघर 


 मंदिरों से कोई मेरा नाता बहुत अच्छा नहीं है लेकिन देओघर को अगर  कहे मंदिरों का घर है तो 
क्रमश अगले भाग में.…………………………………।